40 प्रतिशत महिलाएं असुरक्षित महसूस करती हैं और 3 में से 2 रिपोर्ट नहीं करतीं, क्या सरकार फर्जी आंकड़ों के पीछे छिपी है?
NARI 2025 रिपोर्ट ने 31 भारतीय शहरों में 12,770 महिलाओं से बात की। 40 प्रतिशत अपने शहर में असुरक्षित महसूस करती हैं। अपने शहर में। वो जगह जहां वो रहती हैं, काम करती हैं, बच्चे पालती हैं। 40 प्रतिशत को वहां सुरक्षित महसूस नहीं होता। 2024 में 7 प्रतिशत महिलाओं को सार्वजनिक जगहों पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। और 24 साल से कम उम्र की महिलाओं में यह 14 प्रतिशत तक पहुंच जाता है। युवा महिलाएं। कॉलेज छात्राएं। काम करने वाली लड़कियां। 14 प्रतिशत को सार्वजनिक जगह पर उत्पीड़न का सामना करना पड़ा। और यह सिर्फ सर्वे में बताया गया है। असली नंबर शायद कहीं ज्यादा है। सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि उत्पीड़न झेलने वाली 3 में से 2 महिलाएं कभी रिपोर्ट तक नहीं करतीं। न पुलिस को। न परिवार को। न दोस्तों को। वो बस चुप रहती हैं। क्यों? क्योंकि उन्हें पता है कुछ नहीं होगा। क्योंकि उन्हें खुद को दोषी ठहराए जाने का डर है। क्योंकि रिपोर्ट करने की प्रक्रिया खुद दर्दनाक है। रिपोर्ट कहती है कि NCRB आंकड़े सिर्फ बर्फ के सिरे को दिखाते हैं क्योंकि इतने मामले दर्ज ही नहीं होते। NCRB ने 2024 में 4.41 लाख महिलाओं के खिलाफ अपराध दर्ज किए। लेकिन अगर 3 में से 2 दर्ज ही नहीं होते तो असली नंबर 13 लाख से ज्यादा हो सकता है। 13 लाख महिलाओं के खिलाफ अपराध एक साल में। मोहल्ले और पब्लिक ट्रांसपोर्ट सबसे बड़े उत्पीड़न हॉटस्पॉट हैं। वो जगहें जहां से महिलाएं बच नहीं सकतीं। सड़कें, बसें, ट्रेनें, ऑटो स्टैंड। सिर्फ 25 प्रतिशत महिलाएं मानती हैं कि अधिकारी शिकायत पर कोई कार्रवाई करेंगे। 25 प्रतिशत। मतलब 4 में से 3 महिलाएं नहीं मानतीं कि पुलिस या अधिकारी शिकायत पर कुछ करेंगे। दिल्ली, पटना, जयपुर और कोलकाता सबसे असुरक्षित शहरों में हैं। ये बड़े भारतीय शहर हैं। छोटे कस्बे नहीं। बड़े महानगर। पति की मारपीट सबसे बड़ी श्रेणी है, 1.2 लाख मामले। 1.2 लाख महिलाओं को अपने ही पति से मारपीत का सामना करना पड़ा। अपने घर में। और ये सिर्फ दर्ज हुए मामले हैं। सरकार बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और महिला सशक्तिकरण योजनाएं घोषित करती रहती है। लेकिन जमीनी हकीकत क्या है? 40 प्रतिशत असुरक्षित महसूस करती हैं। 3 में से 2 रिपोर्ट नहीं करतीं। सिर्फ 25 प्रतिशत को अधिकारियों पर भरोसा है। सरकार NCRB आंकड़ों का इस्तेमाल करके कहती है कि महिलाओं के खिलाफ अपराध नियंत्रण में हैं। लेकिन NARI रिपोर्ट दिखाती है कि आधिकारिक आंकड़े असली पैमाने का एक छोटा हिस्सा हैं। सरकार आंकड़ों से सच को छिपा रही है। जब कोई महिला रिपोर्ट करती भी है तो क्या होता है? उसे थाने जाना पड़ता है जहां अक्सर असंवेदनशील सवाल पूछे जाते हैं। उसे दर्द दोबारा जीना पड़ता है। उसे कोर्ट में आरोपी का सामना करना पड़ता है। उसे फैसले के लिए सालों इंतजार करना पड़ता है। और ज्यादातर मामलों में आरोपी बरी हो जाता है। क्या सरकार आधिकारिक आंकड़ों का इस्तेमाल करके महिलाओं के असली खतरे को छिपा रही है?